Wednesday, 8 November 2017

आसान है क्या ?

शिकायत नहीं है मुझे ,
न ही दस्तूर बदलने की हिम्मत  ,
अस्थिर नही  हूँ , अधीर नहीं ,
अवसाद शायद ,
उदास शायद  ,
कहना  है बस ,
आसान नहीं ,
यूं अकेले रहना। 



दीवार  पर टंगी  बेटी की बनाई,
हैप्पी फैमिली  की पेन्टिंग, 
अलमारी में लटकी तुम्हारी साड़ियां ,
कुछ बंद  मैगी के पैकेट ,
कुछ खुले बिस्कुट ,
बेटे का क्रिकेट का बल्ला,
कह गया  था  रख लो ,
अगली छुट्टियों  में फिर जो खेलना है। 
तुम्हारी लगाई गेंदे की क्यारी सुनहरी हो चली ,
तुल्सी  भी हो गयी हरी पूरी ,
कमरा खाली ,दिल भरा भरा सा ,
आसान है क्या ,
यूं अकेले रहना ?



टेक्नोलॉजी के साधन  अनेक है ,
नहीं प्रतिस्थापित कुछ भी कर पाया ,
तुम्हारा साथ। 
चाहता हूँ लौट जाना घर,
बच्चों को देखूं पढ़ते बढ़ते , 
माँ का बनू  सहारा , दूँ तुम्हे तुम्हारे हिस्से का प्यार  ,
  किस से जा कर कहूँ  मन  का कौतूहल  ,
 संगी साथी, भाई बहन व्यस्त  है, 
उनके हैं अपने अपने कारोबार, परिवार। 
आसान नही है,
यूं अकेले रहना। 



"वह " कहते है किस्मत अच्छी है मेरी ,
जो देश भर में घूमता हूँ , 
पहली को सेलरी  क्रेडिट हो जाती है ,
सुविधाएं  हैं  । 
नादाँ है या फिर बेफिक्र ,
नहीं जानते  , 
मौत खेलने आती है दबे पैर रोज़ यहाँ। 
बर्फ , बारूद  , बारिश , पत्थर , अकेलापन ,
क्या  कुछ सहना पड़ता है ,
आसान नहीं है 
यूं  रहना  ।